साधुमार्गी जैन समता संघ के तत्वावधान में यशवंत निवास रोड स्थित समता भवन पर धर्म सभा में प्रेरक आशीर्वचन जारी
इंदौर
धर्म आत्मा का शाश्वत धन है। यही ऐसा अमूल्य धन है जो जन्म-जन्मान्तर तक आत्मा के साथ बना रहता है तथा उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। धर्म हमारे लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय होना चाहिए। धर्म का सही मूल्य तभी समझ में आ सकता है जब हम उसे केवल सामायिक, प्रतिक्रमण अथवा अन्य धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न मानते हुए सम्पूर्ण जीवन का आधार मानेंगे। धर्म ही वह अमूल्य तत्व है जो प्रत्येक वस्तु को सही दिशा, उचित उपयोग और वास्तविक मूल्य प्रदान करता है। वास्तव में धर्म ही जीवन का वास्तविक एवं अमूल्य धन है। शेष समस्त भौतिक वैभव क्षणभंगुर और नाशवान हैं।
ये प्रेरक उदगार हैं प.पू. आचार्य रामेश के सुशिष्य शासन दीपक प.पू. आदित्य मुनि महाराज के, जो उन्होंने बुधवार को यशवंत निवास रोड स्थित समता भवन में साधुमार्गी जैन समता संघ के तत्वावधान में आयोजित विशाल धर्मसभा में “धर्म की महत्ता” के संदर्भ में व्यक्त किए। आचार्य भगवन प.पू. रामलाल म.सा. के शिष्य प.पू. आदित्य मुनि म.सा., अटलमुनि म.सा., निर्वाण मुनि म.सा. अदिठाणा 4 द्वारा सुबह रामामृतम साधना और दोपहर में ज्ञान चर्चा के आयोजन यशवंत निवास रोड स्थित समता भवन पर होंगे। गुरुवार को सुबह 7 से 8 बजे तक रामामृतम ध्यान साधना, प्रातः 9 से 10 बजे तक प्रवचन एवं दोपहर 2 से 3.30 बजे तक और रात्रि 8 से 9.30 बजे तक ज्ञान चर्चा के आयोजन होंगे। संघ के अध्यक्ष पारस बोहरा एवं मीडिया प्रभारी मनीष बोहरा ने बताया कि समता भवन पर प.पू. पद्म मुनि म.सा., आदित्य मुनि म.सा., अटल मुनि म.सा., निर्वाण मुनि म.सा. अदिठाणा 4 के प्रवचनों की अमृतवर्षा का क्रम जारी है। मीडिया प्रभारी मनीष बोहरा ने बताया कि प्रतिदिन मुनिश्री के प्रवचनों की अमृतवर्षा और उनके श्रीमुख से प्रवाहित हो रही धर्म वाणी का पुण्य लाभ उठाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन धर्म, ध्यान एवं आत्मचिंतन से जुड़कर जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान कर रहे हैं।
मुनिश्री ने “धम्मं-धम्मं-धम्मं-धम्मं, प्राणों से भी प्यारा है, पुदगल सारे मूल्यहीन हैं, धर्म अमूल्य हमारा है” पद से अपने प्रवचनों की शुरुआत करते हुए कहा कि प्राण एक दिन समाप्त हो जाएँगे, शरीर भी नश्वर है किन्तु धर्म आत्मा का शाश्वत धन है। पुदगल अर्थात संसार के भौतिक पदार्थ जैसे धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा, भवन, वाहन, आभूषण और स्वयं यह शरीर भी परिवर्तनशील एवं नश्वरवान है। इनका वास्तविक मूल्य तभी पता चलेगा, जब जीवन में धर्म का प्रकाश आएगा। यदि जीवन में धर्म नहीं है तो धन, अहंकार का कारण बन जाता है, शक्ति अत्याचार का माध्यम बन जाती है, बुद्धि छल-कपट में लग जाती है और वैभव विनाश का कारण बन जाता है लेकिन जब धर्म जीवन में उतरता है तब वही धन दान का स्वरूप धारण कर लेगा, वही शक्ति सेवा का माध्यम बन जाएगी और वही बुद्धि विवेक में परिवर्तित हो जाएगी। तब हमारा जीवन लोकमंगल एवं आत्मकल्याण का साधन बन जाएगा। संसार की सभी भौतिक वस्तुएं अपनेआप में मूल्यवान नहीं हैं।
