दलाल बाग पर चल रहे दिगम्बर जैन समाज के चातुर्मास और पर्युषण महापर्व में संयम धर्म पर प्रेरक आशीर्वचन

इंदौर
भोग विलास तो पशु-पक्षी सहित अनेक योनियों में संभव है लेकिन एक मनुष्य ही ऐसा जीव है जिसे संयम, साधना और आत्म कल्याण की दिशा में आगे बढने के अवसर मिले हुए हैं। मनुष्य जन्म केवल धन कमाने और भोग विलास के लिए नहीं बल्कि आत्म कल्याण और संयम के लिए मिला है। प्रत्येक व्यक्ति का संयम उसकी अवस्था और जिम्मेदारी के अनुसार अलग-अलग होता है। संयम केवल किसी बड़े त्याग का नाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक कर्म को उचित मर्यादा और सीमा में करने की साधना है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि कौन सा कार्य कब, कहाँ और किस सीमा में करना है अथवा नहीं करना है।
ये प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में पर्युषण महापर्व की धर्मसभा में ने सोमवार को छठे दिन उत्तम संयम धर्म की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली, सोनाली बागडिया एवं अर्चना गोधा सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 9 से 10.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है। यहाँ चल रहे श्रावक संस्कार शिविर और दस लक्षण महापर्ण में देश-विदेश से आए हजारों समाज बंधु पूरे उत्साह के साथ अपनी तप साधना में जुटे हुए हैं।
राष्ट्रसंत ने संयम धर्म की व्याख्या के दौरान कहा कि धर में भोजन, पूजा, अध्ययन और विश्राम के लिए स्थान निर्धारित होना चाहिए। जूते-चप्पल पहनना गलत नहीं है लेकिन उनके लिए भी एक सीमा तय होनी चाहिए। मंदिर, घर और अन्य स्थानों की अपनी-अपनी मर्यादा होती है। केवल स्थान ही नहीं समय का संयम भी आवश्यक है। पूजा, अभिषेक, सामायिक और स्वाध्याय जैसे धार्मिक कार्यों के लिए निर्धारित समय का महत्व हमें समझना होगा। जीवन में अनुशासन आने पर घर और परिवार में भी शांति का वातावरण बनता है। जैन श्रावक को अपनी धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हुए दूसरों से अपनी तुलना नहीं करना चाहिए। हमें रात्रि भोजन और व्यसनों से बचने तथा जैन आहार परम्परा को बनाए रखने का प्रयास करना ही चाहिए। हम छोटे-छोटे नियमों से संयम की शुरुआत कर सकते हैं।
श्रावक संस्कार शिविर में उमड़ा समाज बंधुओं का सैलाब – चातुर्मास के चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, नवीन-शिवानी गोधा, आनंद-अंतिका गोधा एवं शिविर के प्रमुख पुण्यार्जक चक्रवर्ती आकाश-आलोक जैन कोयला ने बताया कि पर्यूषण महापर्व के छठें दिन सोमवार को भी शिविर में 10 हजार से अधिक समाज बंधुओं की मौजूदगी बनी रही। प्रवचन के दौरान अनेक अवसरों पर राष्ट्रसंत, जिनवाणी एवं जिनशासन के साथ महावीर स्वामी के जयघोष एवं हर्षध्वनि के दृश्य भी देखने, सुनने को मिल रहे हैं। शहर में रहने वाले दिगम्बर जैन परिवारों की ओर से शिविरार्थियों के लिए प्रतिदिन भोजन का आमंत्रण भी दिया जा रहा है जो शहर के इतिहास में पहली बार हो रहा है। बड़ी संख्या में बाहर से आने वाले श्रावक इंदौर की इस आतिथ्य परम्परा और शिविर की व्यवस्थाओं को देखकर गदगद नजर आ रहे हैं। सोमवार को सुगंध दशमी के पर्व पर शिविर स्थल पर विशेष उत्साह देखने को मिला।
