दलाल बाग पर चल रहे दिगम्बर जैन समाज के चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में प्रेरक आशीर्वचन–मनाया क्षमापना पर्व
इंदौर

गुरु की वाणी सुनना आसान है लेकिन उस वाणी पर अमल करना ही सच्ची परीक्षा है। हम अनेक साधु संतों को सुनते हैं, उनकी बातों से प्रभावित भी होते हैं लेकिन जब उन्ही बातों को अपने जीवन में उतारने की बारी आती है तो हम अपनी सुविधा, शक्ति और हालातों का विचार करने लग जाते हैं। जिस तरह माता-पिता की इच्छा और गुरु की आज्ञा शिष्य के लिए महत्वपूर्ण होती है उसी तरह सच्ची श्रद्धा में व्यक्ति अपनी सुविधा से ऊपर उठकर धर्म के प्रति समर्पित हो जाता है। धर्म को केवल सुनना ही धर्म नहीं है, धर्म को समझना, स्वीकार करना और अपने आचरण में उतारना ही धर्म की वास्तविक साधना है।
ये दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में पर्युषण महापर्व के समापन पर आयोजित धर्मसभा में व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। प्रारम्भ में मंगलाचरण और पाद प्रक्षालन के पश्चात चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, धर्मेन्द्र जैन, गिरीश जैन गिन्नी, संजय सामरिया, धर्मेन्द्र जैन, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है। उधर, श्रावक संस्कार शिविर के समापन पर सामूहिक क्षमापना के कार्यक्रम भी पूरे जोश के साथ जारी हैं। रविवार की शाम को कांच मंदिर में समग्र समाज बंधुओं ने क्षमापना का पर्व और उत्सव पूरे धूमधाम से मनाया।
राष्ट्रसंत ने कहा कि जब गुरु केवल उपदेश देते हैं तो उसे अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार ग्रहण किया जा सकता है लेकिन जब गुरु अपनी इच्छा या आदेश के रूप में कोई बात करते हैं तब शिष्य को केवल यह विचार करते रहना उचित नहीं है “मैं कर पाऊंगा या नहीं, मेरी शक्ति है या नहीं।“ सच्ची श्रद्धा में गुरु की बात को जीवन में उतारने का भाव होना चाहिए। सच्ची लगन होने पर व्यक्ति अपनी शक्ति का हिसाब नहीं लगता। जिस प्रकार माता-पिता की इच्छा और गुरु की आज्ञा शिष्य के लिए महत्वपूर्ण होती है उसी तरह सच्ची श्रद्धा में व्यक्ति अपनी इच्छा से ऊपर उठकर धर्म के प्रति समर्पित होता है। तप, उपवास आदि अपनी शक्ति और क्षमता के अनुसार किए जा सके हैं लेकिन कुछ मूलभूत संस्कार और अनुशासन ऐसे होते हैं जिनमें बार-बार शक्ति का बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए। गलत आदतों और नशे से दूर रहना, माता-पिता का सम्मान करना, गुरु की बात को महत्व देना और धर्म के मूल सिद्धांतों को जीवन में उतारना- ये सब जीवन को दिशा देने वाले संस्कार हैं।
