लोहारपट्टी स्थित खाड़ी के मंदिर पर चल रही भागवत कथा में रुक्मणी विवाह का उत्सव मना, आज समापन, कल अन्नकूट

इन्दौर,
हृदय में पवित्र संकल्प आयेंगें तो विचारों का प्रवाह भी निर्मल हो जाएगा। भगवान की लीलाओं के दर्शन एवं श्रवण से मन के विकार दूर होते हैं और शरीर की इंन्द्रियों पर सात्विक प्रभाव होता है। धर्मग्रंथ सुषुप्त समाज को जागृत एवं चैतन्य बनाते हैं। मनुष्य का जीवन हमें केवल पशुओं की तरह व्यवहार करने के लिए नहीं, बल्कि सदभाव, परमार्थ और सेवा करूणा जैसे प्रकल्पों के लिए भी मिला है। भगवान अनुभूति का विषय है। आत्मा और परमात्मा का मिलन है कृष्ण-रूक्मणी विवाह।
ये प्रेरक विचार हैं भागवत भूषण आचार्य पं. राजेश शास्त्री के, जो उन्होंने लोहारपट्टी स्थित श्रीजी कल्याण धाम, खाड़ी के मंदिर पर हंसदास मठ के पीठाधीश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचरणदास महाराज एवं महामंडलेश्वर महंत पवनदास महाराज के सानिध्य में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में रुक्मणी विवाह प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में रुक्मणी विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। जैसे ही कृष्ण और रुक्मणी बने पात्रों ने एकदूजे को वरमाला पहनाई, समूचा मंदिर परिसर भगवान के जयघोष से गूंज उठा। महिलानों ने नाचते गाते हुए अपनी खुशियाँ व्यक्त की और एकदूसरे को बधाइयाँ भी दी। कथा शुभारंभ के पहले विधायक गोलू शुक्ला, पं. विकास अवस्थी, प्रो. नलिनी जोशी, आर. के. जोशी, सुरेश शर्मा पालदा, अशोक चतुर्वेदी, मुकेश शर्मा, रमेश जोशी, वेदांत शर्मा, राम व्यास सहित अनेक श्रद्धालुओं ने व्यास पीठ का पूजन किया। राधा रानी महिला मंडल की ओर से रुक्मणी शर्मा, करुणा शर्मा, गीता व्यास, उषा सोनी, चंदा खंडेलवाल, बबली खंडेलवाल, निर्मला सोलंकी आदि ने आचार्यश्री की अगवानी की। मठ के पं. अमितदास महाराज ने बताया कि भागवत ज्ञान यज्ञ का विराम 30 दिसम्बर को सांय 4 से 7 बजे तक सुदामा चरित्र प्रसंग के साथ होगा। मंदिर का वार्षिक अन्नकूट महोत्सव 31 दिसम्बर बुधवार को आयोजित होगा।
भागवत भूषण आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि भगवान को धन सम्पत्ति नहीं, मन के श्रेष्ठ भाव चाहिए। वे छप्पन भोग के नहीं, हमारे प्रेम की भावना के भूखे हैं। रूक्मणी मगंल प्रसंग हमारी भारतीय संस्कृति और मर्यादा का गौरवशाली उजला पक्ष है। रूक्मणी विवाह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। कृष्ण योगेश्वर, लीलाधर और नटवर की यही विशेषता है कि वे कृपा वर्षा करते भी हैं तो पता ही नहीं चलने देते। हमारे सभी देवी-देवता प्राणियों के उद्धार के लिए ही अवतरित होते हैं। कंस व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है जो आज भी हमारे समाज में मौजूद है। भगवान ने कंस का वध नहीं, उद्धार किया है।
